राजभा गढ़वी – सौराष्ट्र की धरती की आवाज़ और गुजराती लोककला की आत्मा
25/11/2025
गुजराती लोककवि | लोक साहित्य | डायरा कलाकार | ग्रामीण कविता | गुजराती साहित्य
गुजराती लोकसंगीत में एक अनोखी मिठास है, जो सौराष्ट्र की मिट्टी, ग्रामीण संस्कृति और मानवीय भावनाओं से जन्म लेती है। इस सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने वाले कलाकारों में राजभा गढ़वी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।
गिर क्षेत्र के लिलापाणी नेस गाँव में जन्मे राजभा गढ़वी बचपन से ही लोककथाओं, भजनों और लोकसंगीत के बीच पले-बढ़े।
प्रारंभिक जीवन और संगीत से जुड़ाव
सौराष्ट्र की लोकसंस्कृति ने राजभा गढ़वी के जीवन को आकार दिया। गाँव के मेलों, भजनों और उत्सवों के माध्यम से उन्होंने संगीत की वास्तविक समझ प्राप्त की।
कम उम्र से ही वे लोक कार्यक्रमों में भाग लेते, भजन गाते और कविताएँ याद रखते थे। इन अनुभवों ने उनकी कला को और भी मजबूत बनाया।
डायरा कला के सिद्धहस्त कलाकार
डायरा केवल संगीत नहीं है, यह जीवन की अनुभूति है। राजभा गढ़वी डायरा के माध्यम से हास्य, भक्ति, संदेश और जीवन के सत्य को अत्यंत सुंदर रूप में प्रस्तुत करते हैं।
- प्रभावशाली और शक्तिशाली आवाज़
- भावनाओं से भरे शब्द
- लोक दोहे और कविताएँ
- ग्रामीण संस्कृति से गहरा जुड़ाव
- हास्य के साथ सामाजिक संदेश
हजारों श्रोताओं का ध्यान घंटों तक बाँधे रखने की उनकी क्षमता उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।
लोकप्रिय रचनाएँ
1] नेहड़ो
2] वागड़े से वार्ता
3] छापकड़ू
4] बारिश का छाफखारू
5] झाल की चिट्ठी
6] भगवान जैसी भेड़ियाली
7] 75 पगड़ी नाम रे
8] द्वारका के देव की तो बात ही अलग है
9] हीरे का नखाना
10] मटको
11] रोवड़ू
12] झांझवाणी झंकार
13] बाँसुरी बजे वीरानी में
परंपरा और आधुनिकता का संगम
पारंपरिक लोकसंगीत में आधुनिक स्पर्श जोड़कर राजभा गढ़वी ने नई पीढ़ी को लोकसाहित्य से जोड़ा।
"मोरला तारो" – झवेरचंद मेघाणी को श्रद्धांजलि
झवेरचंद मेघाणी की अमर रचना "मोरला तारो" को राजभा गढ़वी ने अपनी अनोखी प्रस्तुति से एक बार फिर जीवंत कर दिया।