स्तंभेश्वर महादेव - कवि कम्बोई
23/11/2025
(स्तंभेश्वर महादेव कवि कंबोई | लुप्तप्राय मंदिर गुजरात | महासागर ज्वार शिव मंदिर | खंभात की खाड़ी मंदिर | स्कंद पुराण इतिहास | कार्तिकेय तारकासुर कथा | उच्च ज्वार निम्न ज्वार मंदिर | गुजरात आध्यात्मिक स्थल | अद्वितीय शिव मंदिर भारत | कवि कंबोई दर्शन समय)
सोचिए… आप अरब सागर के सुनहरे किनारे पर खड़े हैं, एक प्राचीन शिवलिंग के सामने सिर झुकाए हुए। लहरें आपके पैरों को हल्के-हल्के छू रही हैं। आप कुछ घंटे वहाँ की आध्यात्मिक शांति में बिताते हैं। लेकिन उसी दोपहर जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं—मंदिर गायब!
यही है स्तंभेश्वर महादेव, जिसे पूरे गुजरात में “डूबता हुआ मंदिर” कहा जाता है।
वडोदरा के पास छोटे-से समुद्री गाँव कवि कम्बोई में स्थित यह मंदिर भारत के सबसे रहस्यमय और अनोखे आध्यात्मिक स्थलों में से एक है। अगर आपकी यात्राएँ साधारण से आगे बढ़ती हैं, तो GyaanTrek आपको लेकर आया है इस अद्भुत चमत्कार का पूरा गाइड—जहाँ प्रकृति खुद दिन में दो बार भगवान शिव का जलाभिषेक करती है।
इस गाइड में हम इतिहास, समुद्र विज्ञान, जाने का सही समय और यात्रा से जुड़ी अहम जानकारी सब कुछ कवर करेंगे।
रहस्य: मंदिर आखिर कैसे गायब होता है?
स्तंभेश्वर महादेव का सबसे आकर्षक पहलू है इसका समुद्र के साथ छुपा-छुपी का खेल। तो क्या ये जादू है? या भूगोल का कमाल? मंदिर खंभात की खाड़ी (Bay of Khambhat) में समुद्र के बिल्कुल किनारे बना है। इस क्षेत्र में दुनिया की सबसे ऊँची और तीव्र ज्वार-भाटा (High Tide & Low Tide) देखा जाता है।
- डूबना (हाई टाइड) :
- प्रकट होना (लो टाइड) :
उच्च ज्वार के समय समुद्र का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। पानी मंदिर परिसर में भरने लगता है और शिवलिंग सहित पूरा गर्भगृह डूब जाता है। दूर से सिर्फ मंदिर की ध्वजा (झंडा) पानी के ऊपर दिखाई देती है।
जैसे ही भाटा आता है, पानी धीरे-धीरे पीछे हटता है। मंदिर की फ़र्श समुद्र के साफ पानी से धुल जाती है और श्रद्धालु फिर से शिवलिंग तक पहुँचकर दर्शन कर पाते हैं।
ये प्राकृतिक चक्र हर 24 घंटे में दो बार होता है। यह अनुभव मन में प्रकृति की विशालता और दिव्यता—दोनों के प्रति गहरी विनम्रता जगा देता है।
पौराणिक कथा और इतिहास: स्कंद पुराण की कथा
दृश्य जितना अद्भुत है, उसकी आध्यात्मिक कहानी उतनी ही गहरी है। इसका उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है।
कर्तिकेय का अपराध-बोध
कथा तब की है जब भगवान कार्तिकेय (शिव-पार्वती के पुत्र) ने राक्षस तारकासुर का वध किया था। तारकासुर अत्याचारी था, लेकिन वह भगवान शिव का महान भक्त भी था। उसने कठोर तप करके शिव को प्रसन्न किया था।
कार्तिकेय ने संसार की रक्षा तो की, पर एक शिवभक्त को मारने का अपराध-बोध उन्हें खा गया। वे प्रायश्चित का मार्ग ढूँढ़ने लगे।
भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को सांत्वना दी और उनसे कहा कि वे तीन स्थानों पर शिवलिंग स्थापित करके पूजा करें। कार्तिकेय ने "स्तंभतीर्थ" (आज का खंभात क्षेत्र) में तीन शिवलिंग स्थापित किए:
- प्रतिज्ञेश्वर
- कपालेश्वर
- स्तंभेश्वर (कवि कम्बोई)
"स्तंभेश्वर " नाम ‘स्तंभ’ यानी स्थिरता का प्रतीक माना जाता है—अडिग आस्था का स्मारक।
स्तंभेश्वर महादेव ज्वार-भाटा टाइमिंग (बहुत महत्वपूर्ण)
यह आपकी यात्रा योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्योंकि ज्वार-भाटा चंद्रमा की स्थिति के आधार पर बदलता है, इसलिए कोई निश्चित समय जैसे "रोज सुबह 10 बजे" नहीं होता।
| फीचर | विवरण |
|---|---|
| घटना आवृत्ति : | दिन में दो बार (सुबह व शाम) |
| पूर्ण डूबना | उच्च ज्वार (High Tide) में |
| दर्शन का समय | भाटा (Low Tide) में |
| सर्वश्रेष्ठ दिन | पूनम और अमास |
GyaanTrek प्रो टिप:
पूनम और अमास पर ज्वार-भाटा बेहद तेज होता है। पानी ज्यादा चढ़ता है और ज्यादा पीछे भी जाता है—दृश्य कमाल का होता है। पर हमेशा स्थानीय तिथि, मंदिर ट्रस्ट, या गुजराती पंचांग से समय पहले जांच लें।
सामान्य रूप से मंदिर सुबह से शाम तक खुला रहता है, पर उच्च ज्वार में शिवलिंग तक जाना पूरी तरह से रोका जाता है।