कवि के पिता [दादूदान गढ़वी]
25/11/2025
गुजराती लोक कवि | लोक साहित्य | डायरी कलाकार | ग्रामीण कविता | गुजराती साहित्य
कवि दाद (दादूदान गढ़वी) गुजराती साहित्य के सबसे लोकप्रिय लोककवियों में से एक थे। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था, और बचपन से ही उनके मन में कविता के लिए प्रेम था। उन्होंने जीवन के कड़वे-मीठे अनुभवों को बहुत सरल, सीधे और ग्रामीण अंदाज़ में अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी कविताओं में लोक-संस्कृति, अध्यात्म, प्रेम, पीड़ा, मानवता और ग्रामीण जीवन की झलक साफ दिखाई देती है।
उन्होंने गाँव की बोली और लोकभाषा को कविता में स्थान दिया, ताकि आम जनता आसानी से उनकी रचनाओं से जुड़ सके। उनकी कविताओं में शब्दों की सादगी, भावों की गहराई और जीवन का दर्शन मिलता है। गुजराती साहित्य में कवि दाद का स्थान श्रेष्ठ लोककवियों में होता है।
साहित्यिक योगदान:
- जीवन के भाव प्रस्तुत किए
- सरल और ग्रामीण भाषा
- लोकसंस्कृति का प्रतिबिंब
विशेषताएँ :
- आम लोगों के दिल से जुड़ी रचनाएँ
- लोकपरम्पराओं को जीवित रखा
कवि दाद की कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ (केवल नाम) :
1] काळजा केरो कटको
2] ठाकोरजी नथी ठावूं
3] कैलास के निवासी
4] हिरण हलकारी
5] चित्त हरनु गीत
6] श्री कृष्ण चांदावलीવળી
7] रामनाम बराक्षारीકશારી
8] टेरवा
9] लछनायन
“Kaalja Kero Katko Maro”
मेरे दिल का टुकड़ा गाँठ से छूट गया, जैसे वसंत में मिट्टी फोड़ अंकुर निकल आए।
जिसके पैरों की छाया धरती पर भी नहीं ठहरती थी, वो किसी तरह पहाड़ जैसे आंगन को पार कर गया।
झूला अब झूलता ही नहीं, मृत्यु ने उसे आज़ाद कर दिया, जैसे ग्रहण ने मेरे चाँद को निगल लिया हो।
नीम-इमली की डाल भी उसे पुकार रही है, धरती उसकी कमी से गूँज रही है।
कदम-कदम पर रास्ता सैकड़ों गाँव बन गया, ढलान के नीचे उतरते ही मेरा सूरज डूब गया।
मेरा लाड़ला खज़ाना लूट गया, जैसे जान निकल गई हो, मैं बिल्कुल खाली रह गया।